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Tuesday, July 14, 2015

हिंदी का वैश्विक स्वरुप

आज हम हिंदी को जिस रूप में देख-सुन पा रहे हैं वो हमें गौरवान्वित करती है| दुनिया भर के लोग हिंदी सीख–सिखा रहे हैं| हिंदी के इस सीखने-सिखाने के कड़ी में आज हम डॉ. जी.पी. शर्मा से जानेंगे कि चीन में हिंदी पढाते हुए वो कैसा अनुभव करते हैं और वहाँ हिंदी की क्या स्थिति है ? आपको बता दूँ, डॉ. शर्मा चीन के गुआंगडांग अंतर्राष्ट्रीय भाषा विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं|
हिंदी इस समय राष्ट्रीय भाषा ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय भाषा है| हिंदी ने आज के समय में अपनी स्थिति को काफी मजबूत किया है| हिंदी पहले की तुलना में साहित्यिक सांस्कृतिक सामाजिक  दृष्टी से समृद्ध हुई है| भूमंडलीकरण के इस दौड़ में दुनिया भर का ध्यान अब मंडारिण, हिंदी और स्पैनिस दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा हैं| इनका कारण साहित्य पर्यटन और व्यबसाय है|
हिंदी इस समय दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर है| पहले स्थान पर चीनी भाषा मंडारिण और तीसरे स्थान पर स्पैनिस| अंग्रेजी का स्थान चौथा है लेकिन दुर्भाग्य है कि अंग्रेजी को हिंदी से ऊपर रखा जाता है और हिंदी को उसके बाद|
हिंदी बोलने और समझने वालों की संख्या में बहुत बड़ा अंतर है| हिंदी समझने वालों में से नेपाल, भूटान , बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान देश भी शामिल है| इसमें नेपाल, पाकिस्तान और बंगलादेश हिंदी बोलते भी है| हाँ पाकिस्तान और बंगलादेश की लिपि फारसी है नहीं तो हिंदी का स्वरुप और बड़ा सिद्ध किया जा सकता था|
फिजी, मपाना, त्रिनिडाड, टुबैगो और मारिशस में भी हिंदी का बोलबाला है| यहाँ भारतीय मूल के लोग हिंदी बोलने में गौरव महसूस करते हैं और उनकी तादाद अच्छी खासी है| आज कि स्थिति ये है कि दुनिया हिंदी को व्यापारिक उद्देश्य से भी सीख रही हैं|

चन्द्रशेखर : डॉ.साहब आप हमें ये बताईये कि चीन में हिंदी की क्या स्थिति है ?
डॉ. शर्मा : चीन में हिंदी की स्थिति बहुत मजबूत है| 10 से अधिक विश्वविद्यालयों में ये मुख्यभाषा के रूप में पढ़ाई जा रही है |विजिंग विश्वविद्यालय में अनेक स्तरीय शोध यह दर्शाते हैं कि हिंदी चीन में न केवल व्यापार में है बल्कि साहित्य एवं संस्कृति में भी| हिंदी पर सैकड़ों  शोधपत्र चीन के विविध विश्वविद्यालयों में प्रस्तुत किये गए हैं | जिससे यहाँ अप्रतित होता है कि संस्कृत के बाद चीन ने सबसे अधिक ध्यान हिंदी पर दिया है |विदेशी भाषाओँ में अंग्रेजी तो वहाँ केवल बोलने के स्तर तक लोग सिखाना-सीखना पसंद करते हैं लेकिन हिंदी को गंभीर अध्ययन के लिए पढते-पढाते हैं| चीन में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल हैं |
चन्द्रशेखर :  आप सही कह रहे हैं,हिंदी दुनियाभर में फ़ैल रही है लेकिन अपने देश में हिंदी की स्थिति अच्छी नहीं है|कमाल पासा ने तुर्की को अनिवार्य रूप से राजभाषा बनाया था तब जाके लोगों ने उसे सिखा था लेकिन हिंदी के लिए हमारे देश में कोई दृढ संकल्प नहीं है| हम अंग्रेजी बोलकर गौरव महसूस करते हैं, हिंदी को बोलकर नहीं |
डॉ.शर्मा:  हाँ चन्द्रशेखर जी हकीकत तो यह है कि बीजिंग विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर च्यानचिंग ने एक मुलाकात में मुझसे कहा कि “ शर्मा जी  हिंदी में विद्वानों की कमी नहीं है पर प्रेमियों की है| जैसे हम मंडारिन बोल कर गर्व का अनुभव करते हैं वैसे आपके यहाँ हिंदी बोलने में गर्व का अनुभव मैंने नहीं देखा|  मैं भारत जाता हूँ तो देखता हूँ कि हिंदी के प्रोफ़ेसर मुझसे तो मुझसे अपने लोगों तक से हिंदी में बात करते हैं| इस मामले में डॉ.नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह अपवाद है जो हिंदी में ही बात करना पसंद करते हैं|”
चन्द्रशेखर : हाँ विजिंग के प्रोफ़ेसर की बात सही है लेकिन मैं यह भी देखता हूँ कि मोदी जी हिंदी के विकास पर ध्यान दे रहे हैं|
डॉ.शर्मा:  चन्द्रशेखर जी मोदी जी के अकेले ध्यान देने से अच्छा है कि हम सभी बराबर ध्यान दे |तभी हिंदी का सही विकाश होगा| मोदी जी संघाई गए थे| इसमे मैं भी गया था |चीन में रह रहे भारतीय को उन्हें संबोधित करना था, काफी संख्या में वहाँ भारतीय पहुंचे थे| लेकिन उनके मंच संचालक न जाने क्यों अंग्रेजी में ही सबकुछ कह-सुन  लेना चाहते थे, जबकि मोदी जी ने अपना भाषण हिंदी में दिया| जो चीनी हिंदी बोलते हैं वे अपने बातों में अंग्रेजी शब्दों को स्थान नहीं देते| जबकि हम भारतीय या तो अंग्रेजी में बात करना चाहते हैं या अंग्रेजी युक्त हिंदी|  जो हिंदी के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है |
चन्द्रशेखर :  जिस विश्वविद्यालय में आप पढाते हैं उसमे विद्यार्थियों की हिंदी किस स्तर की है ?
डॉ. शर्मा : मैं जिस विश्वविद्यालय में पढाता हूँ उसके विद्यार्थी हिंदीमय हैं| उन्होंने अपने नाम तक हिंदी में रखे हैं| वे जब हिंदी बोलते हैं तो हिंदी बोलने के क्रम में एक बार भी विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी शब्द का प्रयोग नहीं करते सुना| वे प्रथम वर्ष में वर्णमाला सीखते हैं एवं तीसरे वर्ष के प्रथम सत्र में ही हिंदी साहित्य का इतिहास पढते हैं| इससे आप उनके हिंदी के प्रति रूचि एवं इसके ज्ञान का स्तर का खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं|
चन्द्रशेखर :  आप नयी पीढ़ी को क्या सन्देश देना चाहते है ?
डॉ. शर्मा :  मैं अपने नयी पीढ़ी से ये अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी मातृभूमि और राष्ट्रभाषा में बोलकर गौरव महसूस करे और उसे प्रयोग में लाएँ| मैं मानता हूँ कि अंग्रेजी जरुरत की भाषा हो सकती है परन्तु गौरव की भाषा नहीं| लोग अनावश्यकरूप से अंग्रेजी बोलकर जो गौरव महसूस करते हैं, वह वास्तव में गौरव का विषय नहीं है| सचमुच जब हमलोग हिंदी बोलकर गौरव का अनुभव करने लगेंगे, तभी हिंदी के विकाश के नए सोपान गढे जा सकेंगे| दुनिया के जितने भी देश आज विकास के शिखर पर हैं, उन्होंने अपनी शिक्षा और विकाश के सरे कार्यक्रम अपनी भाषा में ही किये हैं| चीन,जापान,रूस श्रेष्ठ उदहारण हैं| हमें भी अगर विकास के सोपान तय करने हैं तो अपनी भाषा को उपयोग में ही लाना होगा| 

Saturday, May 17, 2014

साक्षात्कार : डॉ. देवेश सी.जिनवाला से चन्द्रशेखर प्रसाद की बातचीत

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कभी भी अपनी पर्सनल इनफार्मेशन नहीं डालनी चाहिए |
                                                                                            - डॉ. देवेश सी.जिनवाला
प्रश्न पूछते हुए चन्द्रशेखर प्रसाद
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सिक्यूरिटी के लिए यूज़र्स को क्या सावधानिया रखनी चाहिये ?
उत्तर देते हुए डॉ.डी.सी.जिनवाला
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कभी भी अपनी पर्सनल इनफार्मेशन नहीं डालनी चाहिए जैसे जन्म तिथि-जिसका उपयोग प्रायः सिक्यूरिटी वेरिफिकेसन के लिए भी किया जाता है| दोस्त के दोस्त जिसको आप अच्छे से नही जानते हो उन्हें अपने एकाउंट में नहीं रखना चाहिये क्योंकि वे आपकी पर्सनल इनफार्मेशन का दुरुपयोग कर सकते है|
सोशल नेटवर्किंग  साइट्स पर जो अप्प्लिकेसनस होती है उनकी टर्मस  और कंडीशनस को बहुत ध्यान से पढकर निर्णय लेना चाहिये| इन टर्म्स एंड  कंडीशनस में आप अपने डाटा को उन कंपनियों को प्रयोग करने हेतु अनुमति देते है जिसको वे भविष्य में बेचकर या अन्य किसी प्रकार से दुरुपयोग कर सकते है|
किसी तीसरे व्यक्ति को अपना पासवर्ड प्रयोग के लिए कभी न दे| ऐसा कोई पासवर्ड न रखे जो आपके नाम,जन्मतिथि आदि से सम्बन्धित हो और आसानी से अनुमान लगया जा सके| हमेशा सिक्योर साइट्स जैसे – एच.टी.टी.पी.एस. का प्रयोग करना चाहिए जिसमें पासवर्ड एन्क्रिप्टेड (encrypted) फॉर्म में  होता है|
हमें  पासवर्ड 11111,1234,नाम,जन्मतिथि आदि प्रकार से नहीं रखने चाहिये | हम अपनी किसी प्रसिद्ध कहावत के शुरुआत या अंत के दो या तीन शब्दों को मिलाकर एक सिक्योर पासवर्ड बना सकते है|

प्रश्न- 
अपने प्रोजेक्ट रिसर्च के बारे में कुछ बताइए?सुना है अपने विभाग को बाहर से भी सहयोग राशि मिली है|
उत्तर-       
ईसरो नेटवर्किंग-सिक्यूरिटी के क्षेत्र में 8 लाख रूपये का फण्ड दिया है| इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत Configurable Link Layer Security Architecture Design किया गया जिसका नाम Flexisec है| ये प्रोजेक्ट पुर्ण हो चूका है| साथ ही यह कार्य के ईसरो जर्नल में भी प्रकाशित हो चूका है|
Wireless Sensor Network के क्षेत्र में रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए डी.इ.आई.टी.(Department of Electronichs and Information Technology) Ministry of Information and Communication Technology ने 48 लाख का फण्ड दिया है| इसमें सिक्योर डाटा एग्रीगेसन (Secure Data Aggration )और Instruction Detection System पर कार्य चल रह है| इस प्रोजेक्ट पर सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ राजस्थान के 2 छात्र समर इंटर्नशिप भी कर चुके है|  
 गुजरात कौंसिल ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने WSN में रिप्लाई प्रोटेक्शन टेकनिक्स के क्षेत्र में शोध के लिए 3 लाख रूपये का फण्ड दिया है|
इन प्रोजेक्ट्स में डॉ डी.सी.जिनवाला इन्वेस्टीगेटर (Investigator) और  एस.जे.पटेल (co investigater)है| इन प्रोजेक्ट्स ने WSN के क्षेत्र में कई लोगो को कार्य करने का अवसर प्रदान किया है| इनमें प्रमुखतः  केयूर परमार सीनियर रिसर्च फेलो (SRF) हिमांसु पटेल जूनियर रिसर्च फेलो (JRF) कार्य कर रहे है| इस क्षेत्र में वर्तमान में बी.टेक.(चन्द्रशेखर प्रसाद,अर्पणा अलका,आकांक्षा डिमरी,सोनाली,किंजल,रश्मि,अनुराधा आदि ) तथा ऍम.टेक. के कई छात्र डॉ. जिनवाला सर के मार्गदर्शन में प्रोजेक्ट कर रहे है|
प्रश्न – 
बहुत दिनों से एस.वी.एन.आई.टी. में नए भर्तियां (Recruitments)नहीं हुए है| साथ ही वर्तमान स्टाफ का प्रमोशन भी नहीं हुआ है इसका क्या कारण है इससे संबधित भविष्य में आपकी क्या योजनाये है?
उत्तर:
कुछ दिन पहले हमें सरकार से ऐसा आदेश मिला था की MHRD के द्वारा (Recruitments) भर्तियां हेतु नए नियम लागु होने वाले है| जब तक नए नियम  आ नहीं जाते तब तक हम नया (Recruitments) नहीं कर सकते है| फिर दिसम्बर में एंट्री लेवल (अस्सिस्टेंट प्रोफेसर) के पद नियुक्ति हेतु आदेश आया था जब भी कभी MHRD से ऐसा आदेश आता है तो हमें इसका अप्रूवल बोर्ड  ऑफ़ गवर्मेंट से लेना पड़ता है|
नया MHRD रूल 15 जनवरी को आया जिसके अनुसार नए भर्तियां (Recruitments)  के प्रोसेस के लिए बोर्ड ऑफ़ गवर्मेंट से मीटिंग करके अप्रूवेल लेनी है और रिटायरमेंट ऑफ़ चेयरमैन बाद अब चुनाव के कारण मीटिंग नहीं हो पा रही है, परन्तु जल्द ही भर्तियां (Recruitments) होगा|


Saturday, March 29, 2014

साक्षात्कार : डॉ. के. डी. यादव से चन्द्रशेखर प्रसाद की बातचीत

हिन्दी हमारी राजभाषा है एवं इसका ज्ञान हम सभी को होना चाहिए                                                                   *       डॉ. के. डी. यादव
डॉ. के. डी. यादव, सहायक प्रोफ़ेसर, सरदार वल्लभभाई राष्ट्रीय प्रौघोगिकी संस्थान सूरत, का जन्म झाँसी उत्तरप्रदेश में 29 नवम्बर 1974 को हुआ था| प्राथमिक,मैट्रिक, इंटरमीडियट की शिक्षा आपने यू.पी. बोर्ड से प्राप्त किया| फिर आपने नागपुर विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियरिंग BE (CIVIL) एवं विक्रम विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग ME (ENVIRONMENT) की पढ़ाई पूरी कर अध्ययन का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आई.आई.टी.कानपुर से PHD (ENVIRONMENT) डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त किया| आप एस.वी.एन.आई.टी. सूरत में का. हिंदी अधिकारी एवं जन-संपर्क अधिकारी का कार्यभार सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं| राजभाषा प्रचार –प्रसार हेतु आपके द्वारा किये जाने वाले प्रयास अत्यंत सराहनीय है|आपके इस सफल प्रयासों के परिणाम स्वरुप ही विवेकानंद शैक्षणिक सांस्कृतिक एवं क्रीडा संस्थान देवघर द्वारा एस.वी.एन.आई.टी. सूरत को 50वीं वर्षगांठ पर तकनिकी संस्थान होने के बाबजूद भी राजभाषा के प्रचार-प्रसार व सराहनीय योगदान देने हेतु  “गोल्डेन पिकोक ऑनोर अवार्ड” की मानक उपाधि से अलंकृत व विभूषित किया गया|जनसंपर्क अधिकारी होने के साथ–साथ आपका उत्तम व्यक्तित्व आपकी लोकप्रियता को दिन-प्रतिदिन एक नयी ऊंचाई दे रही है| चन्द्रशेखर प्रसाद का डॉ.के.डी.यादव  से एक मुलाकात के बीच हुई बातचीत के कुछ अंश |

      
       ईमेल :
       kdjhansi@yahoo.com
       kdjhansi@gmail.com
        
       संपर्क :
       +91-94 28 398 266



चन्द्रशेखर प्रसाद : ( प्रश्न पूछते हुए )   महोदय

1.    आप हिंदी अधिकारी हैं आपको तमाम सरकारी कामकाज करने पड़ते हैं | हिंदी को भारत संघ की राष्ट्रभाषा बनाने में कौन-कौन सी कठिनाईयां सामने आती है ?
उत्तर : हिंदी को संघ की राजभाषा बनाने में कोई कठिनाई नहीं है  क्योंकि  भारत के संविधान के
अनुच्‍छेद343(1) के अनुसार हिंदी तो पहले से ही संघ की राजभाषा है  हमें संघ की राष्ट्रभाषा बनाने हेतु केवलअपनी मानसिकता  बदलने  की आवश्यकता है क्योंकि  अभी भी हम अपनी भाषा  के मामले  में  स्वतंत्र नहीं हैं। राजभाषा अधिनियम  1963 एवं राजभाषा  नियम, 1976 में  हिंदी में काम करने के बारे में  पहले से ही स्पष्ट निर्देश  हैं कि हमें  सरकारी  कामकाज में हिंदी का प्रयोग करना है लेकिन राजभाषा नियम, 1976 पर पूरी  तरह से  अमल नहीं कर रहे हैं। धारा 3(3) के अंतर्गत 14 दस्तावेजों  को किसी  भी हालत में द्विभाषी रूप में  जारी करना अनिवार्य है  लेकिन  इस  धारा का  शतप्रतिशत  पालन नहींहो रहा है  यदि हम इन नियमों का अच्छी तरह  से  पालन  करें तो कोई कठिनाई नहीं है |
 2.    राजभाषा हिंदी की वर्तमान स्थिति से क्या आप संतुष्ट हैं ?
उत्तर : मैं राजभाषा हिन्दी की वर्तमान स्थिति से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हूँ क्योंकि हमारे देश में बहुत सारे सरकारी विभागों में आज भी हिन्दी में बिलकुल भी कार्य नहीं होता है| जो  हिन्दी भाषा के भविष्य  लिए एक दुखद और चिंता का विषय है,परन्तु पहले के मुक़ाबले दिनोदिन लोगों में हिन्दी भाषा के प्रति लोकप्रियता बढ़ रही है ।लोग हिंदी फिल्मे, कवि-सम्मेलन , संगीत आदि का खूब आनद उठा रहे हैं | यदि हम खुद हिंदी में काम नहीं करेंगे तो दूसरों को कैसे प्रोत्‍साहित करेंगे ? मेरा कार्यक्षेत्र तकनीकी के साथ-साथ हिंदी का भी है  और राजभाषा के प्रचार-प्रसार हेतु किये गए प्रयासों का नजारा आप संस्थान में भली-भांती देख पाएंगे |आये दिन हिदी अनुवाद, सॉफ्टवेर  प्रशिक्षण अदि के कार्यशालाओं के आयोजन के साथ-साथ कई प्रतियोगिताओं व कार्यक्रमों  का आयोजन हम करते रहे हैं और प्रयास जारी है|    
3.    हिंदी आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित हो चुकी है लेकिन भारत में आज भी उसे अपनों से सम्मान की आशा निरर्थक सी हो रही है |इस बिषय में आपका क्या कहना है ?
उत्तर : इसमें कोई शक नहीं है कि हिंदी आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापित हो चुकी है   आज  आप फेसबुक पर देखें तो दिन  दिन हिंदी में या अपनी  मातृभाषा में प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ती जा  रही  है आज कल हिंदी को  लेकर बहुत सी परिचर्चाएँ, गोष्ठिया व कार्यशालाओ  का  आयोजन किया  जा रहा  है लेकिन अपनी भाषा को लेकर जो उत्साह होना चाहिए उसकी हम भारतीयों में बहुत कमी  है| जैसा कि मैंने आपको पहले ही  बताया है कि हमारे देश में हिंदी में  काम करने के लिए लोगों  को केवल अपनी मानसिकता बदलने की  आवश्यकता है । यूरोपियन  हिंदी विद्वान रेवरेण्ड फादर  डा. कामिल  बुल्के तुलसी  हिंदी से प्रभावित हो  सत्र 1935 में  स्वदेश (बेल्जियम) त्याग कर जीवन पर्यंत भारतीय नागरिकता लेकर भारत में ही रहे| उन्होने   स्पष्ट कहा :"अंग्रेजी यहाँ अतिथि के रूप में  ही रह सकती है , बहुरानी के रूप में नहीं | संस्कृत माँ , हिंदी गृहणी और अंग्रेजी नौकरानी है |" 
4.    हिंदी का अतीत गौरवशाली वर्तमान समृद्ध और भविष्य उज्जवल रहा है| फिर भी हिंदी  में बहुत  कुछ करना शेष है| आपकी दृष्टि में वे ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ हिंदी में काम किये जाने की जरुरत है?
उत्तर : आपका यह सवाल सही है कि हिंदी में अभी बहुत कुछ करना शेष है । मेरी नजर में ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां हमें हिंदी में काम करने की अत्‍यंत आवश्‍यकता है जैसे सबसे पहले विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, विश्‍वविद्यालयों में विशेषकर अभियांत्रिकी और विज्ञान के क्षेत्र में और उसके बाद अपने निजी जीवन में हिंदी में काम करने की बहुत आवश्‍यकता है। इसके साथ-साथ हिन्दी के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करके भी हम लोग हिन्दी की गरिमा को बढ़ा सकते हैं ।
5.    हिंदी को सबसे ज्यादा किस भाषा से खतरा हैं और हिंदी अपने को उसके सामने कैसे प्रतिस्थापित कर सकती है ?
उत्तर :  हिंदी को ही नहीं हमारी समस्त भारतीय भाषाओं को सबसे ज्यादा अंग्रेजी भाषा  से ही खतरा है।वर्तमान समय में अंग्रेजी सिर्फ  हिंदी पर ही हावी नहीं है बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं  पर  भी हावी है।  हमें अपनी भारतीय  भाषाओं का विकास करना जरूरी है ताकि कोई विदेशी  भाषा हमारी भारतीय  भाषाओं को हानि  पहुंचा सके। विभिन्न भाषा का ज्ञान रखना बुरी बात नहीं है परन्तु अपनी राजभाषा का ज्ञान रखना एवं प्रयोग करना नितांत आवश्यक है| यह स्वाभिमान कि बात है | बड़े बड़े कार्यक्रमों में राजभाषा का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी का ही प्रयोग करें |
6.    हिंदी भारत की राजभाषा है लेकिन इसे राष्ट्रभाषा का रूप नहीं दिया जा सका |आप इसे राष्ट्र भाषा बनाने के पक्ष में हैं या नहीं ?
उत्तर : इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि हिंदी हमारे देश की राजभाषा है, इसे तो 14 सितंबर, 1949 को ही संघ की राजभाषा घोषित कर दिया गया था और जब से हमारे देश का संविधान लागू हुआ, तब से हिंदी भी संवैधानिक रूप से राजभाषा के रूप में लागू हो गई। मैं हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा बनाने के पक्ष में हूँ क्योंकि हर किसी को अपनी मातृभाषा प्रिय होती है और ऐसा करना भी देशहित में होता है ।राजभाषा का प्रयोग करना भी देशभक्ति ही है |
7.    राजभाषा के प्रचार-प्रसार में आपके द्वारा किये गए प्रयास प्रेरणास्पद हैं | संस्थान में अब तक किये गए प्रयासों की विस्तृत जानकारी दें |
उत्तर : मैं अपने कर्तव्‍य को पूरी मेहनत एवं लगन और ईमानदारी से निभाने के लिए हमेशा तत्‍पर रहता हूं| तकनीकी क्षेत्र में भी  राजभाषा के प्रयोगों को बढ़ावा देने हेतु प्रयासरत्त हूँ । मेरा हमेशा से यही प्रयास रहा है कि संस्थान के सभी विद्यार्थी – शिक्षक,अधिकारी हमेशा हिंदी ही प्रयोग में लायें | इसके लिए मैं खुद हिंदी कम-काज व पत्राचार में हिंदी ही प्रयोग करता हूँ और दूसरों को भी प्रेरित करता हूँ | सरकारी कार्यालयों से भारत सरकार की भी यही अपेक्षा है  कि  कार्यालय चाहे केंद्रीय सरकार के अंतर्गत हो या राज्‍य सरकार के अंतर्गत, बैंक हो या उपक्रम अथवा निकाय सभी अपना सारा काम यूनिकोड-हिंदी  में करें। राजभाषा विभाग द्वारा हिंदी में काम करने के लिए बहुत सारे सॉफ्टवेयर विकसित करवाए गए हैं जिनका उपयोग करें जैसे कि अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के लिए 'मंत्र-राजभाषा सॉफ्टवेयर', हिंदी में डिक्‍टेशन देने के लिए 'श्रुतलेखन-राजभाषा', भाषा शिक्षण के लिए 'लीला हिंदी प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ सॉफ्टवेयर' 'ई-महाशब्‍दकोश' इन सब सॉफ्टवेयरों का प्रचार-प्रसार करें और अधिक से अधिक उपयोग करें। हिंदी का प्रयोग कंप्‍यूटरों पर भी सभी लोग करने में समर्थ हो इसलिए समय-समय पर कार्यशालाओं का आयोजन भी करता आया हूँ | जिसमे यूनिकोड सक्रिय कैसे करें, अपने कार्यालय का या निजी काम, पत्राचार, अनुवाद  हिंदी में कैसे करे आदि की जानकारी दी गयी । इसके साथ-साथ संस्थान की वार्षिक पत्रिका “सम्मुख“  का भी प्रकाशन होता हैं और इस बार हमने संस्थान की त्रैमाषिक पत्रिका “ ध्वनि “का प्रथम संस्करण  का भी सफल प्रकाशन किया है | यह हिन्दी भाषा को एक नया आयाम देने का प्रयास है। संस्थान में हिन्दी पखवाड़े और विश्व हिन्दी दिवस पर कई प्रतियोगिताओं  का आयोजन किया जाता है ताकि हिन्दी भाषा के प्रति लोगों में जागरूकता उतप्न्न हो सके । जिसमे हम विजयी प्रतिभागी को पुरस्कृत भी करते है|पिछले हिंदी पखवाडा में 1 लाख 26 हज़ार एवं विश्व हिंदी दिवस 87 हज़ार रुपये की  नकद राशि विजेताओं के बीच वितरित किया | संस्थान में हिन्दी भाषा के प्रति बढ़ती लोकप्रियता इसका ही परिणाम है ।

                                                            धन्यवाद !
                                                                                                          
                                                                                        © चन्द्रशेखर प्रसाद